मित्रों ! इस पोस्ट को पढने वाले कई पाठकों ने कभी न कभी कॉन्डोम का प्रयोग किया ही होगा और शायद मन में यह सवाल भी उठा होगा कि आखिर इन सब की शुरुआत कब हुई ?
तो आज आप सब के लिए यह पोस्ट पब्लिश किया जा रहा है जिसमे हम बताएँगे कि इस सब कि शुरुआत कब से हुई | आशा है आप सब को यह पोस्ट पसंद आएगी |
कॉन्डोम का इतिहास सदियों पुराना है और इसे मुख्यतः दो चीजो के लिए किया जाता था पहला तो गर्भ निरोधक के तौर पर और दूसरा संभोग के दौरान होने वाले इन्फेक्शन से बचने के लिए और हाँ आज जैसे आप लेटेक्स और रबर के जो कॉन्डोम इस्तेमाल करते हैं न पुराने समय में
कॉन्डोम इनसे नहीं बल्कि जानवरों की आँतों से , बैल या सुवर की चमड़ी से बनते थे | चाइना में तो कॉन्डोम सिल्क पेपर और एक खुशबूदार तेल से बनते थे पर इस तरह के कॉन्डोम केवल शाही परिवारों के लिए ही थे क्यूंकि उस समय कॉन्डोम एक विलासिता की वस्तु थी
आजकल तो बनिए की दुकान पर भी कॉन्डोम मिल जाता है पर एक समय ऐसा भी था जब लोग एक कॉन्डोम को एक बार से ज्यादा इस्तेमाल करते थे क्यूंकि कॉन्डोम बहुत महंगा हुआ करता था |
फिर 16वीं शताब्दी में इटली के एक डॉक्टर गैब्रियल फाल्लोपियो ने उन्होंने एक रिसर्च पेपर में एक ऐसी वस्तु का जिक्र किया जिसे आज आप और हम सब कॉन्डोम के नाम से जानते हैं | उस समय गैब्रियल ने जो कॉन्डोम डिजाईन किया था वह लिनेन का बना था और उसे एक केमिकल में डूबा के रखा जाता था | उन्होंने 1100 लोगो पर इसका परीक्षण भी किया और उन 1100 लोगो में से किसी एक को भी सिफलिस जैसी कोई बीमारी नहीं हुई | और फिर बस उसके बाद तो कॉन्डोम बहुत ही पॉपुलर हो गया इसको फैक्टरियों में बनाया जाने लगा | और अब कॉन्डोम अलग अलग साइज़ और अलग अलग चीजो से बनाये जाने लगे जैसे सल्फर से मुलायम की गयी जानवरों की आंतो से |
धन्यवाद !
तो आज आप सब के लिए यह पोस्ट पब्लिश किया जा रहा है जिसमे हम बताएँगे कि इस सब कि शुरुआत कब से हुई | आशा है आप सब को यह पोस्ट पसंद आएगी |
आजकल तो बनिए की दुकान पर भी कॉन्डोम मिल जाता है पर एक समय ऐसा भी था जब लोग एक कॉन्डोम को एक बार से ज्यादा इस्तेमाल करते थे क्यूंकि कॉन्डोम बहुत महंगा हुआ करता था |
कॉन्डोम को प्रसिद्धि कैसे मिली ?
साल 1449 में फ्रांस की सेना में सैनिकों के बीच सिफलिस नाम की एक बीमारी फ़ैल गयी थी जिसके कारण सिफलिस से ग्रस्त मनुष्य का मांस गलने लगता था और कुछ ही महीनों में उसकी मृत्यु हो जाती थी | बाद में पता लगा कि ये बीमारी यौन सम्बन्ध बनाने के बाद होती थी | उस समय कई डॉक्टरों ने इसका इलाज ढूंढा पर वह असफल रहें | और साल 1505 आते आते सिफलिस नाम की यह बीमारी पुरे एशिया तक फ़ैल चुकी थी | अब तक सिफलिस का कोई इलाज नहीं मिला था |फिर 16वीं शताब्दी में इटली के एक डॉक्टर गैब्रियल फाल्लोपियो ने उन्होंने एक रिसर्च पेपर में एक ऐसी वस्तु का जिक्र किया जिसे आज आप और हम सब कॉन्डोम के नाम से जानते हैं | उस समय गैब्रियल ने जो कॉन्डोम डिजाईन किया था वह लिनेन का बना था और उसे एक केमिकल में डूबा के रखा जाता था | उन्होंने 1100 लोगो पर इसका परीक्षण भी किया और उन 1100 लोगो में से किसी एक को भी सिफलिस जैसी कोई बीमारी नहीं हुई | और फिर बस उसके बाद तो कॉन्डोम बहुत ही पॉपुलर हो गया इसको फैक्टरियों में बनाया जाने लगा | और अब कॉन्डोम अलग अलग साइज़ और अलग अलग चीजो से बनाये जाने लगे जैसे सल्फर से मुलायम की गयी जानवरों की आंतो से |
पहले के कॉन्डोमस में दिक्कते भी कई थी जैसे उनमे छेद हो जाना | तो इस कारण लोग कॉन्डोम इस्तेमाल करने से पहले उसे गुब्बारे की तरह फूंक के देखते थे कि कहीं इसमें छेद तो नहीं है |अगर यह पोस्ट आपको अच्छी लगी हो या इस बारें में आप का कोई सुझाव हो तो नीचे कमेंट करें या हमें ईमेल करें yuva.health101@gmail.com पर
धन्यवाद !
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